शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

कामदेव कर पूजा कर दिन हके अनंग त्रयोदशी - अशोक “प्रवृद्ध’

                    कामदेव कर पूजा कर दिन हके अनंग त्रयोदशी

                                  -अशोक “प्रवृद्ध

उत्कल मेल, रायपुर, दिनांक- 31 मार्च 2026 




चैत महीना कर सुकल पख कर तेरस (त्रयोदशी) के अनंग तेरस कहल जायला। अनंग, कामदेव कर ही एगो नाम हके, एहेले ई दिन कामदेव कर पूजा करल जायला। कामदेव कर पूजा करले मनुख कर रूप-रंग आउर सुभाव मनमोहक होय जायला। ऊकर में अइसन खिंचाव आवेला कि जे केउ ऊकर से मिलेला, उ ऊकर परभाव में आय जायला।
अनंग तेरस के कामदेव कर पूजा करले विपरीत-सम्बन्ध (प्रेम संबंध) में सफलता मिलेला। ई बछर 2026 में, चैत सुकल तेरस 31 मार्च दिन मंगर (मंगलवार) के पड़त हे, एहेले ओहे दिन अनंग तेरस कर परब मनायल जाई। मानल जायला कि ई दिन महादेव, माता पारबती, कामदेव आउर रति कर पूजा करले पिरीत गहिरा होवेला। ई दिन खास करके माया आउर जोड़ा-जेंवरी (दांपत्य) जीवन ले भारी महतव रखेला। माया-बिहा (प्रेम विवाह) में आवे वाला अड़चन मन दूर होय जायना आउर घर-संसार में मरद-मेहरारू के बीच नीक तालमेल बनल रहेला। ई दिन कुछ खास उपाय करले जोड़ा मनक जिनगी सुख-सांति से भईर जायला। ईकर से एक दिन पईहले चैत सुकल द्वादशी के मदन द्वादशी मनाल जायला। कामदेव के मदन नाव से भी जानल जायला, से ले ई दिन भी कामदेव के हे समर्पित मानल जायला। पुराण मन में कामदेव के माया (प्रेम) आउर काम कर देवता मानल जाला। उनकर रूप-रंग एकदम जवान आउर मनमोहक है। ऊ बिहाएल हँय आउर रति उनकर मेहरारू (पत्नी) हकैं। ऊ एतना बलवान हँय कि उनकर ले कोनो ढाल चाहे कवच कर बात नी करल जाय। उनकर दोसर नाम मन में रागवृंत, अनंग, कंदर्प, मनमथ, मनसिजा, मदन, रतिकांत, पुष्पवान अउर पुष्पधंव भारी परसिद्ध हे। कामदेव, माई लछमी आउर भगवान बिष्नु कर बेटा हँय। कृष्ण कर बेटा प्रद्युम्न के कामदेव कर अवतार मानल जाला। हिंदू धरम कर वैष्णव मन, कामदेव कर आध्यात्मिक रूप के कृष्ण भगवान कर ही रूप मानेना। कामदेव कर धनुष परकिति कर सबले बेसी मजबूत चीज मन में से एगो हके। ई धनुष मनुख कर काम (इच्छा) में थिरता आउर चंचलता नियर उल्टा गुन मन से भरल है। एहेले ईकर एगो कोना थिरता कर आउर दोसर कोना चंचलता कर निसानी हके। बसंत, कामदेव कर संगी (मीत) हँय, एहेले कामदेव कर धनुष फूल मन से बनल रहेला। ई धनुष कर डोरी (कमान) ले कोनो आवाज नी निकलेला। ईकर मतलब ई है कि काम (प्रेम) में सालीनता आउर धीरज जरूरी है। तीर, कामदेव कर सबले बड़ हथियार हके। ई जेके भी बींधेला, ऊकर से पहिले न तो आवाज करेला आउर न ही सिकार के संभलेक मौका देवेला। ई तीर कर तीन कोना होवेला, जेके तीनो लोक कर निसानी मानल जायला। एकर में एगो कोना ब्रह्मा जी कर अधीन है, जे जनम (निर्माण) कर निसानी हके। ई दुनिया के बढ़ाएक में मदद करेला। दोसर कोना बिष्नु भगवान कर अधीन हे, जे ओंकार माने कि पेट भरेक ले होवेला। ई मनुख के करम करेक प्रेरणा देवेला। कामदेव कर तीर कर तीसरा कोना महादेव कर अधीन हे, जे मकार माने कि मोछ (मुक्ति) कर निसानी हके। ई मनुख के मुकति कर डहर बतायला। काम (सृष्टि) खाली दुनिया बढ़ाएक ले जरूरी नखे, बल्कि मनुख के करम कर डहर बताएक आउर अंत में मोछ देवेक रस्ता भी देखाएला। कामदेव कर धनुष कर निसाना विपरीत लिंगी (मरद-मेहरारू कर खिंचाव) होवेला। एहे खिंचाव से बंध के पूरा दुनिया चलत हे। कामदेव कर एगो लक्ष्य उ खुद हँय, जेके पुरुष मानल जायला, आउर दोसर रति हँय, जेके जनाना रूप में जानल जायला। कवच सुरक्षा कर निसानी हके। कामदेव कर रूप एतना बलवान है कि जे ऊकर सुरक्षा नी करल जाई तो उ तबाही (विप्लव) लाय सकेला। एहेले ई कवच कामदेव कर सुरक्षा ले बंधल है। मतलब ई कि सुरक्षित काम, परकिति कर बेबहार ले जरूरी मानल गेल हे, ताकि समाजीक बुराई आउर भयंकर बेमारी मन के दूर राखल जाय सके।

कथा कर अनुसार जब राक्षस तारकासुर भारी उधुम (आतंक) मचाय रहे, तब ऊकर बध ले देबता मन कामदेव से बिनती करलैं कि ऊ महादेव आउर पारबती कर बीच मया (प्रेम) जगाय दें। कालेकि तारकासुर के ई बरदान मिलल रहे कि खाली शिव-पारबती कर बेटा ही ऊकर बध कर सकेला। तब कामदेव आउर देवी रति, महादेव कर ध्यान भंग करे ले कैलास परबत गेलैं। कामदेव कर बाण लागते महादेव कर ध्यान तो भंग होय गेलक, मंतुक उ मने मने बहुते खिसियाय गेलैं। महादेव आपन तीसरा आँईख खोईल के कामदेव के भसम (जलाय) कईर देलैं। आपन मरद कर मउत पर रति के बड़ खिस लागलक, आउर उ पारबती के सराप दे देलक कि पारबती कर कोख (पेट) से कोनो बेटा जनम नी लेई। ई सराप सुइन के पारबती दुखी होय गेलयं, तब महादेव पारबती के समझालैं कि दुखी नी होवेक चाही, आउर फिर उमन बिहा करलैं। जब देबता मन ई सराप आउर कामदेव कर भसम होवेक बात सुनलैं, तब उमन भारी घबराय गेलैं। तब देबता मन छल से तारकासुर के ई बरदान दिलायलैं कि ऊकर बध खाली शिव से जन्मल बेटा ही कईर सकेला। पाछे महादेव कामदेव के फेर जिन्दा करलैं आउर भगवान कार्तिकेय तारकासुर कर बध करलैं।
 

राष्ट्रीय नवीन मेल, रांची, डाल्टनगंज, दिनांक- 30 मार्च 2026 


कामदेव कर रूप आउर उनकर शक्ति के बताएक ले ई अंग मन भारी महतव रखेना।
फूल कर धनुष- ई माया आउर कोमलता कर निसानी हके।
फूल कर पाँच तीर- ई तीर मन मनुख कर पाँच इंद्रिय मन के जगाय ले होवेना।
मछरी कर निसानी वाला झंडा (मकरध्वज)- ई उनकर पहचान कर निसानी हके।
तोता कर सवारी- कामदेव सुगा (तोता) कर सवारी करेना, जे चंचलता कर निसानी है।
बसंत ऋतु के कामदेव कर खास संगी मानल जायला।

पुरान कथा मन में कामदेव कर आँईख, भों (भौं) अउर कपाड़ (माथा) कर बारे में विस्तार से बतायल जाय हे। उनकर आँईख मन के बाण माने कि तीर कर दरजा देवल जाय हे। सरीर कर बनावट में आँईख कर मतलब ठीक उनकर हथियार तीर नियर मानल जायला। उनकर भोंह मन के कमान (धनुष कर डोरी) कहल जायला। ई मन एकदम सांत रहेना, मंतुक इसारा-इसारा में ही आपन सब बात कईह देवेना। इमन के कोनो सहारा चाहे संग कर दरकार नी होवे। कामदेव कर कपाड़ धनुष नियर है, जेकर में चंचलता भरल रहेला, मंतुक उ पूरी तइर से थिर (स्थिर) रहेला। कपाड़ पूरा सरीर कर सबले ऊपर कर हिस्सा हके, जे मनुख के डहर (दिशा) देखाएला।
 
हाथी के कामदेव कर वाहन मानल जाय हे। हालाँकि, कुछ सास्तर मन में कामदेव के सुगा (तोता) कर ऊपर बैठल भी देखाएल जाय हे, मंतुक असल में हाथी के ही उनकर सवारी मानल जायला। परकिति में हाथी एके अइसन जीव है, जे चारो कोइना (दिशा) में खुल्ला घूमेला। मसत चाल से चले वाला हाथी तीनो कोना देख सकेला आउर पाछे से तनिक भी आहट आवेले संईभल जायला। हाथी आपन कान से हर बटे कर आवाज सुइन सकेला आउर आपन सूँड़ से चारो बटे वार (हमला) कईर सकेला। ठीक अइसने कामदेव कर सुभाव (चरित्र) भी देखेक ले मिलेला। ऊ खुल्ला रूप से चारो कोइना घूमेना आउर कोनो भी बटे तीर छोड़ेक ले तइयार रहेना। कामदेव कोनो भी किसिम कर बोली चाहे आवाज के तुरते भांप लेवेना।
 
कामदेव कर तीर कोनो लोहा चाहे काठ कर नखे, बल्कि फूल मन से बनल हे। ई पाँच तीर मनुख कर मन आउर इन्द्रिय मन पर अलग-अलग असर करेना।
अरबिन्द (कमल) तीर मन में माया कर कोमलता आउर सुभाय जगायला।
अशोक तीर मनख के बिकल (बेचैन) कर देवेला आउर माया ले तड़प पैदा करेला।
अम्बा (आम) कर मंजरी माने कि अम्बा फूल वाला ई तीर मन में गहिर खिंचाव अउर सम्मोहन पैदा करेला।
नवमल्लिका (चमेली) तीर मन के सांत मंतुक माया में डूबल राखेक ले होवेला।
नीलोत्पल (नीलकमल) तीर सबले गहिर होवेला, जे मनुख के मया में पूरी तइर से मदमस्त (उन्माद) कर देवेला।
ई पाँच तीर मनुख के देखेक, सुनेक, छुवेक, सूंघेक अउर चखेकर इन्द्रिय मन के जगाय के माया कर एहसास दिलायेना।






कामदेव कर पूजा कर घरी ई मंत्र कर जाप करले मनचाहा फल मिलेला-
"
ॐ कामदेवाय विद्महे, पुष्पबाणाय धीमहि, तन्नो अनंग प्रचोदयात्।"

अनंग तेरस कर पौराणिक कथा भी प्रचलित है। बहुते पुरान बात हके, जब सती माता आपन देह त्याग देलैं, तब महादेव (शिव) भारी दुखी होय के घोर तपस्या में लीन होय गेलैं। ओहे बखत तारकासुर नाम कर राक्षस देबता मन के भारी दुख देवत रहे। ओके ई बरदान रहे कि खाली महादेव कर बेटा ही ओकर बध कर सकेला। मंतुक महादेव तो तपस्या में डूबल रहैं, एहेले देबता मन चिन्ता में पड़ि गेलैं। तब सब देबता मन मिल के कामदेव करा गेलैं आउर उनकर से बिनती करलैं कि ऊ महादेव कर मन में माता पारबती ले माया (प्रेम) जगाय दें। कामदेव आपन मेहरारू रति के संगे लइके कैलास परबत गेलैं। महादेव कर तपस्या भंग करे ले कामदेव आपन पुष्प बाण (फूल कर तीर) महादेव पर चलाय देलैं। तीर लगते महादेव कर आँखि खुलि गेलक आउर उनकर तपस्या भंग होय गेलक। मंतुक कामदेव कर ई बेबहार से महादेव के भारी खिस (क्रोध) लागलक। उ आपन तीसरा आँईंख  खोललैं आउर कामदेव के तुरते भसम (जलाय) कर देलैं। आपन मरद के भसम होते देख के रति लोर ढराय (रोने) लागली आउर महादेव से दया कर भीख मांगली। रति कर दुख देख के महादेव के दया आइ गेलक। उ कहलैं कि कामदेव अब बिना सरीर कर रहबै, एहेले उनकर नाम अनंग (बिना अंग वाला) होई। पाछे महादेव कहलैं कि द्वापर जुग में जब भगवान कृष्ण कर जनम होई, तब कामदेव उनकर बेटा प्रद्युम्न के रूप में जनम लेबै। जे दिन कामदेव भसम होय के फेर अनंग रूप में जियैत भलैं, उहे दिन चैत सुकल तेरस रहे। एहेले ई दिन के अनंग त्रयोदशी कहल जायला। मानल जायला कि ई कथा के सुइने से घर-संसार में मया अउर सुख-सांति बनल रहेला।

शनिवार, 28 मार्च 2026

बीचे खोईर नागपुरी (नवा डहर, नवा जोश)

                                             बीचे खोईर नागपुरी

                   (नवा डहर, नवा जोश)




आयो- बाबा, भाई- बहिन!

रऊरे मन सब के जोहार, सादर प्रणाम।
 

कोनो (कउनो) भी नवा काम के सुरू करेक ले हमर नागपुरी समाज में 'गोड़ लागेक' आउर 'सुमिरन' कर बहुते भारी महतव है। आईझ जब हम ई ब्लॉग कर माध्यम से रउरे मन से जुड़त ही, तो सभे से पईहले उ ऊपर वाला आउर अपन पुरखा मनके गोड़ लागत ही। प्रार्थना खाली कोनो धरम कर काम नी हके, ई मन कर ताकत हके। जब हम कोनो काम के नीक नियत आउर भगवान कर आसीरवाद ले के सुरू करिला, तब हमर मन में एगो अजबे किसिम कर जोश आय जायला। कोनो भी नवा कोलम या नवा काम कर सफलता उकर नीव पर टिकल रहेला। जदि नीव में प्रार्थना आउर मेहनत कर मिलाप होवी, तो भविष्य जरूर उज्ज्वल होवी।

हमर नागपुरी भासा-संस्कृति कर भविष्य उज्ज्वल बनाएक ले हमरे के संगे चलेक परी। जइसन सुरुज कर पहिली किरन अंधार के मेटाए देवेला, ओहे नियर हमर साफ़ सुथरा विचार आउर प्रार्थना हमर डहर कर कांटा मनके हटाए देवेला। ई कोलम, जेकर नाम (नाव) “बीचे खोईर नागपुरी” राखल जात है, कर माध्यम से हमर कोसिस रही कि हम आपन संस्कृति के नवा पीढ़ी तक पहुँचाब आउर सभे कर मंगल कर कामना करब। मेहनत कर पसीना आउर भगवान कर भरोसा, इहे दु गो चीज है, जे कोनो भी साधारण आदमी के असाधारण बनाय देवेला। आउ, आईझ ई नवा सुरूआत संगे हम सभे आपन-आपन क्षेत्र में नाम कमाए कर आउर समाज के आगे बढ़ाय कर संकलप लेईल। तो एहे संकल्प कर साथ आईझ 'बीचे खोईर नागपुरी' कर माध्यम से हम रउरे मनक घर- आंगन आऊर दिल तक पहुँचत ही। हमर नागपुरी समाज में 'खोईर' माने कि गाँव कर बीच कर डहर या चौक, उ जगह हके जहाँ सभे मिल-जुल के बइठयना, दुख-सुख बाँटयना और भविष्य कर ताना-बाना बुनयना। कोनो भी नवा काम के सुरू करेक से पईहले प्रार्थना और उज्ज्वल भविष्य कर कामना करेक हमर पुरखा मनक रीत हके। प्रार्थना खाली हाथ जोड़ेक नी हके, ई आपन भीतर कर बिस्वास के जगाएक कर एगो तरीका हके। जब हम कोनो काम के भगवान कर भरोसा और नीक नियत से सुरू करिला, तब आधा सफलता तो उहे मिल जायला। जइसन दीया बारेक से पईहले बाती और तेल कर जरूरत होवेला, उहे नियर उज्ज्वल भविष्य ले कड़ा मेहनत आऊर भगवान कर आसीरवाद कर जरूरत होवेला।


'
बीचे खोईर नागपुरी' कर माध्यम से हमर कोसिस रही कि हम आपन भासा-संस्कृति कर जोत के जगाए रखब। आईझ कर जुग में जदि हमरे मेहनत कर डहर में चलब और सभे कर भला सोचब, तो हमर भविष्य जरूर उज्ज्वल होवी। ई कोलम हमर और रउरे बीचक एगो अइसन कड़ी बनी, जहाँ हमरे मन आपन माटी कर महक के दुनिया तक पहुँचाब। आऊ, आईझ ई नवा सुरूआत संगे हम सभे आपन-आपन क्षेत्र में नाम कमाएक कर आऊर समाज के आगे बढ़ाय कर संकलप लेईल। मेहनत हमर पहचान बनो आऊर प्रार्थना हमरे कर ताकत।
परमात्मा सभे कर डहर सुगम करबयं। मंगल करबयं आऊर सभे के उज्ज्वल भविष्य देबयं।

                                                            रउरे कर आपन-

                                                                                                                                                                अशोक “प्रवृद्ध”

                                         लेखक, आध्यात्मिक चिन्तक व साहित्यकार

                                                        बीचे खोईर नागपुरी,

                                                     ऊंची तकिया, मुरुनगुर

गुरुवार, 26 मार्च 2026

राम कर महिमा

                                             राम कर महिमा

अशोक "प्रवृद्ध"


अयोध्या कर राजा राम, पुरुषोत्तम भगवान,
जेकर नाम जपले, मिले सब सुख-धाम।
धनुष धरल हाथ में, माथा पर मुकुट साजे,
महिमा अपार जेकर, सारा जग में गाजे।
दीन-दुखारी कर साथी, न्याय कर अवतार,
भक्त मनक बेड़ा के, ऊहे करें पार।
शबरी कर जुठा बेर, प्रेम से जे खायें,
अहिल्या कर पत्थर देही, जेकर छुअले मानुख बनि जायें।
हनुमान कर हिया में, बसें प्रभु राम,
भरत कर भक्ति देखि, झूमे सारा धाम।
रावन कर अहंकार के, जे पल में मिटायें,
सत्य और धरम कर, झंडा के फहरायें।
जय श्री राम जपले, कटे सब कलेश,
आशीर्वाद बरसे जेकर, घर-द्वार और देश।
राम नाम कर डोरी, कबहू ना छूटे,
एहे भक्ति सागर में, भक्त मन डूबे।

महूदी कर जयकारा- अशोक "प्रवृद्ध"

                                             महूदी कर जयकारा

अशोक "प्रवृद्ध"



जाग उठलक बड़कागांव, जागल महूदी कर शान,
भगवा झंडा लहरे गगने, भक्तु मनक बढ़लक मान।
रामभक्त मन जमल हईं, माथा तिलक विराजे,
ढोल, ताशा और नगाड़ा, गूंजत मधुर बाजे।
"जय श्रीराम" कर नारा गूंजे, पर्वत और मैदान,
वीर हनुमान कर कृपा बरसे, बाढ़े सबकर शान।
महूदी कर डहर-डहर में, राम नाम कर शोर,
श्रद्धा और भक्ति कर देखू, चारों बटे जोर।
बाप-दादक ई परंपरा, हमर पुरखा मनक प्यार,
शोभायात्रा निकसत देखू, खुश है सारा संसार।
अस्त्र-शस्त्र कर खेल देखाईं, बीर जवान मन,
मर्यादा पुरुषोत्तम राम कर, राखब हमे सनमान।
एक साथ मिलि-जुलि के, उत्सव ई मनायब,
महूदी कर पावन माटी में, राम धुन बजायब।
जय श्रीराम! जय हनुमान! गूंजे ऊंच आवाज,
बड़कागांव कर सउभे रामभक्त, राखें हमर लाज।

मुरुनगुर कर रामनवमी- अशोक "प्रवृद्ध"

                                     मुरुनगुर कर रामनवमी

-अशोक "प्रवृद्ध"





जाग उठलक मुरुनगुर, जागल प्राचीन सान,
खुदी साहू चबूतरा में, विराजे हनुमान।
बजरंगी कर कृपा बरसे, गूंजे जय श्रीराम,
रामनवमी कर धूम देखू, सउभे गोटे ग्राम।
ढोल-ताशा कर थाप बाजे, लहरत भगवा झंडा,
रामभक्त मनक हिया में, भक्ति कर बरसे ठंडा।
अस्त्र-शस्त्र कर खेल देखाईं, मुरुनगुर कर बीर,
रामकुमार कर संग सउभे, धरें हृदय में धीर।
पुरखा मनक बनावल ई, पावन हनुमान थान,
मुरुनगुर कर माटी में, राम नाम कर सान।
गली-गली और डहर-डहर, गूंजे सुंदर गान,
रामनवमी कर ई उत्सव, हमर असली पहचान।
जय श्रीराम! जय हनुमान! गूंजे ऊंच आवाज,
मुरुनगुर कर रामभक्त, राखें गांव कर लाज।

रामभक्त हनुमान की जय!