मंगलवार, 25 अगस्त 2026

रजरप्पा कर महारानी

                                                        रजरप्पा कर महारानी

                                                         -अशोक “प्रवृद्ध”





रजरप्पा कर संगम में, भैरवी-दामोदर कर मेल,
काट के मुण्ड माई देखालक, अजब शक्ति कर खेल।
अशोक कर कलम से, प्रवृद्ध सत्य कर बानी,
तोय ही हकिस माई, जुग-जुग कर महारानी।।
कण्ठ से बहे तीन धारा, अमृत कर ई धार,
जया-विजया तृप्त होली, मिटक भूख कर भार।
काम-रति कर ऊपर आसन, जग कर ई आधार,
मोह-माया कर फान्द के, काटिस तोर तलवार।।
ना कोनो श्रृंगार तोर, ना कोनो वस्त्र काय,
दिगम्बरा रूप धइर के, सब के देलस जगाय।
हूँ-हूँ कर गर्जना से, काँपेला ई संसार,
भगत मन लागिन माई, तोय दया कर भंडार।।

बिना मुण्ड कर काया तोर, कबंध कर तोय साथ,
सब कर संकट दूर करे, तोर महिमा कर हाथ।
अशोक “प्रवृद्ध” गावेला, तोर चरन में माथ,
मुक्ति कर डहर देखाबे, ओगो जगन्नाथ कर साथ।।



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