ईशावास्योपनिषद नागपुरी भाषा में पद्यानुवाद
-अशोक "प्रवृद्ध"
यजुर्वेद
40 एवं ईशावास्योपनिषद कर महान संदेश के
नागपुरी (सादरी) भाषा कर मिठास और संस्कृति में ढाईल के एगो मौलिक काव्य (कविता) -
तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।।
-यजुर्वेद 40, ईशावास्योपनिषद 1
नागपुरी पद्यानुवाद -
एगोई ब्रह्म हय कनिकन में, जे
देखायला ई संसार में।
जड़-चेतन सब ओकर रूप हे, समायल सुंदर आकार
में।।
लोभ-ललच के छोड़ू संगी, त्याग भाव
के मन में धारू।
अपन कमायल सुंदर जियू, दोसर धन पर दीठ ना
मारू।।
नागपुरी में कविता कर अर्थ -
ई दुनिया में जे कुछ भी जीव-जंतु,
पेड़-पालो और चलइया-फिरइया चीज़ मन दीसेला, उ
सब में भगवान (ईश्वर) कर वास है। उहे हर जगह समायल है। एलागे, मन से लोभ आऊर लालच के हटाए के, त्याग कर भावना से ई
संसार कर सुख मनक भोग करेक चाही। कखनो केकरो दोसर कर धन-दउलत के देखेक नी चाही और
ना ही ओकर लालच करेक चाही।
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कुर्वन्नेवेह
कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।।
- यजुर्वेद 40/2,
ईशावास्योपनिषद 2
नागपुरी काव्य
अनुवाद (पद्य रूप)
करम करत ई
दुनिया में, जियेक चाही सौ साल।
आलस छोड़ि
पुरुषारथ करबा, तब मिटि संताप जंजाल।।
एहे एक डहर है
मुकती कर, दूसर कोनो नखे उपाय।
हरि आग्या में
जे करम करी, ओकरा करम बंध न लेपाय।।
-अशोक
“प्रवृद्ध”
नागपुरी अर्थ-
मनुष्य के चाही कि ऊ ई संसार में वेद में बताल धर्म कर अनुसार कर्म करते हुए ही
सम्मान पूर्वक सौ बरिस तक जियेक कर इच्छा करी।
जब मनुष्य आलस्य
कर त्याग कइरके पुरुषार्थ माने कठिन परिश्रम करेला,
तबे ऊकर जीवन कर
सब कष्ट, मानसिक संताप आऊर सांसारिक मायाजाल (जंजाल) समाप्त होई।
निष्काम भाव से
निरंतर कर्तव्य कर डहर में चलते रहेक ही मोक्ष (मुकती) कर एके गो डहर है। इकर अलावा संसार कर बंधन से
छूटेक कर आऊर दोसर कोनो शोर्टकट डहर नखे ।
जे मनुष्य सब
कुछ भगवान कर आग्या आऊर लोक कल्याण माईन के आपन कर्म करेला, ऊके ऊ कर्म कभी भी
पाप- पुण्य कर बंधन माने करम बंध में लपेटेक नी पाय। ऊ व्यक्ति कर्म हुए भी
जीवनमुक्त रहेला।